Bhoomi

From the Writer’s Desk

My soul lying inside the cage of my body is my strength, my power and my guiding force. It is my soul which governs my feelings, emotions, passions, ideas and thoughts. What I believe, what I think, how I react, how I behave, what I desire etc everything is rooted in my soul. My soul is a streamline of the big ocean of my creator. Who am I? What am I? It is my soul which determines my existence.

But for everyone I am a twenty two year old girl named BHOOMI SRIVASTAVA. I am basically from Sitapur, Uttar PradeshI love being a writer. It is the most fulfilling job I’ve ever had. Call it intuition, but one day, my fantasy books are going to be read all over the world. But, I try to not let that premonition distract me from writing for fun or writing for me. I stick to level-headed goals and achievable dreams.

Being a human, am a good and responsible daughter of my mother Mrs. Amita Srivastava. I am loved, liked, supported, encouraged, guided and respected by her and only by her. Yes I am not belonging to my father since my childhood and he is no more now.

I usually write Poetries and short stories. Well, I’m not really an artist.  I mean, I AM but I’ve never been formally trained in art and well, I’ve just worked to create a style that matches my words. Today I want us to practice owning our GIFT and TALENT as writers. Even if we’re not generating any income from it.  Talent and ability are not always cash-making but are still real and worth our belief.

I being a human when find someone deprived of any basic need of life; I cry and feel their pain. It is my soul which directs me to stand by poor and destitute who need our sympathy and help. I being a human if won’t understand the feelings of other humans then who else will come from skies to save them and help them to stand. I try to make others happy and I fear to hurt anyone. I help my poor friends and feel happiness in helping others. I believe I am none other than a human being. I can’t be more than a human.

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मैं और मेरा आइना

दरवाजे की देहलीज़ के पार टंगा,आइना बड़ी देर तलक मुझे देखे जा रहा है,
जानता है,सब राज जो छुपे हैं दिल की फलक पर तभी इतना इतरा रहा है|

जो चल रही उलझने मेरे भीतर तितर-बितर होकर,उसे सब बताना चाहती हूँ,
जो बचे-कुचे सवाल पूछ नहीं पाई अब तक,उसका जवाब पाना चाहती हूँ||

पर सुई मेरी इस बात पर अटकी है कि उससे नजरे नहीं मिला पा रही हूँ,
अब मुट्ठी को कस कर बाँध,नज़रे चुराकर जो मन आये कहे जा रही हूँ|

मेरी पलकों की कशमकश देख, इस हालत पर आइना मंद मंद मुस्कुरा रहा है,
फिर पूछता मुझसे तेरा ही अक्स सामने खड़ा तेरे फिर भी इतना घबरा रहा है?

जानता हूँ, मुश्किल है खुद से सच बोलना ये कह कर पास अपने बुला रहा है,
निकाल सब गर्दिशें और खलिश इत्मिनान से मुझको मुझसे ही मिला रहा है||

ज़िन्दगी

अभी तो चले ही थे कि ज़िन्दगी तेजी से भागती जा रही,
सोने का भी वक़्त नहीं देती अब फट से जागती जा रही|

अधूरे स्वप्न मुकम्मल करने का फरमान सुनाए जा रही,
लगता है,काफी जल्दी में तभी यह गान गुनगुनाये जा रही |

परवाह नहीं रही कोई बात की बस चली की चली जा रही,
शोर से बचकर देखो भला बस सन्नाटे भरी गली जा रही|

कितनी दगाबाज़ है?मेरी होकर भी मुझसे ही खोई जा रही,
मिलकर मौत से कफ़न में लिपट कर चुपचाप सोई जा रही |

अकेलापन

यूँ तो अब जिन्दगी में बहुत कुछ पा चुकी हूँ
गुल्लक भरने भर का पैसा भी कमा चुकी हूँ

फिर भी जिन्दगी में कुछ ना कुछ कमी सी है
हर वक़्त आँखों में बसने वाली एक नमी सी है

शम्स के निकलने से ढलने तक का,जो वक़्त है
ना जाने मेरे लिए इतना ज्यादा क्यों सख्त है

दिन भर तिगड़म करके वक़्त तो थाम लेती हूँ
पर अधूरी नींद में किसी अपने का नाम लेती हूँ

बार बार खुद पर,बंदरो की तरह गुर्रा जाती हूँ
कमरे के सन्नाटे को देख कर मुरझा जाती हूँ

कोई तो हो,जो दिल के दरवाजे की घंटी बजाये
कोई तो हो,जो बिखरे घर को हाथों से सजाये

ये कहकर रोज़ मैं खुद से थक सी जाती हूँ
कच्ची नींद में ही सही, पर सो सी जाती हूँ

   चमकता सितारा

कुछ- कुछ यूं हुआ कि फिर कुछ नहीं हुआ,
शायद जो हुआ, फिर वो भी, कहां सही हुआ|

रह गया बस मलाल दिल के किसी कोने में,
फिर उठा सवाल खुद से ही, खुद के होने में||

बुलंदियों को छूने का ख्वाब अधूरा रह गया,
लुढ़का फिर ऐसे कि पड़ा का पड़ा रह गया|

वो सपना और अपना दोनो ही काश हो गया,
अब कुछ नहीं होगा इसका विश्वास हो गया||

खिड़की की सुरंग से आई किरणों ने बताया,
कि वक़्त तो अब भी है अभी कहां वक़्त गया|

मंजिल भी अब हमसफ़र बनकर इंतज़ार में थी,
वह भी तो,अब खूबसूरत सफ़र के ख़ुमार में थी||

फिर कुछ यूं हुआ कि हर दफा फिर वही हुआ,
मां की आंखों का तारा,चमकता सितारा ही हुआ||

आख़िरी मोहब्बत

मजबूरियों तले दबकर, अधूरा इश्क़ जो तुमने खोया है,
कई अनगिनत रातों में तकिया जो तुमने भिगोया है|

कमरे की छोर पर बैठ, आंसुओं को जो तुमने पिरोया है,
जख्मों को अपने भीतर कोने में जो तुमने संजोया है||

कई दफ़ा उसे भूलने के ख़ातिर नशा कर बैठे होगे,
शायद उसे देखने के ख़ातिर खुद से लड़ बैठे होगे|

जानती हूँ, नहीं हूँ वो जिसकी तुम्हें तलाश रहती है,
पर उसकी जैसी बनने की मुझे बड़ी आस रहती है||

इन दर्दनाक हालातों का क़त्ल-ए-आम करना चाहती हूँ,
हाँ! अब यह गुनाह भी मैं सरेआम करना चाहती हूँ|

रख सको याद हमेशा वही आयत बनना चाहती हूँ,
बरस सकूं तुझ पर बस वही इनायत बनना चाहती हूँ|

खैर पहली नज़र की वो सोहब्बत नहीं बनी तो क्या?
तुम्हारे पाक़ इश्क़ की आख़िरी मोहब्बत बनना चाहती हूँ||

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