Ambar

From the Writer’s Desk

Hello everyone, myself Ambar

I’m from Punjab. I have started writing poetry in the month of April last year i.e April 2019. From the beginning, I used to read others work and also famous poets work. Basically I love to read Urdu poetry and also want to write using Urdu vocabulary. I’m mostly interested in Hindi poetry. I am not too good in writing but i want to give it my best.

I have all basic knowledge of Hindi and Urdu poetry structures. Some times, I used to write Doha, Chaupaai Chhands etc. Writing poem is my passion. As everyone know, we can do anything for our passion, that’s the reason, I’m here. Writing gives me freedom to think whatever I want and put it in words. As writing is the way you can change someone’s mentality, someone’s view over a myth or kind of topics we can’t raise generally because of some issues raised by our society.

We all are with different mindset and I also a different way of thinking over things. And being a writer I can explore my inner thoughts, convey them to the world, with my words.I am also thankful to the whole team of ‘The Writer’s Villa’. They are supporting talented people who know how to convey their thoughts within few words and with great intensity. I am glad to be the part of this family.

Once again thank you’ The Writer’s Villa’.

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अपसरा-ए-हुस्न

रागिनी सी सुनाई दी सदा कुछ  
मानो कुबूल हुई मेरी दुआ कुछ  
 
आज तक तो कभी कुछ न हुआ  
पर जब देखा तुझे तो हुआ कुछ  
 
जी करता है क़रीब आ के तेरे  
करूं दिल की बातें बयाँ कुछ  
 
क्या रूप पाया है गुलबदन ने  
जैसे हो गुलाब-ए-गुलसितां कुछ  
 
ये तेरे मदहोश करते हैं नैन मुझे  
मानो हो  कातिलाना  अदा कुछ  
 
मुस्कान  पे तो  मर ही  जाएं हम  
हूर ने भी पाया जोबन आपसा कुछ 

वास्तविकता

इश्क़, वादे-वफ़ा और प्यार क्या है
इज़हार-ए-मोहब्बत इक़रार क्या है

बाहरी रौनक पे मोहित है ज़माना
न जाना किसी ने वास्तविक निखार क्या है

कुकर्म करके यूँ नासमझ बने बैठे हैं लोग
जैसे कोई रेपिस्ट पूछे बलात्कार क्या है

मर्दानगी दिखाते फ़िरते हैं बेबस लोगों पर
इससे बढ़कर मज़लूम का शिकार क्या है

कद्र उसी को है जिसको वो चीज़ ना मिली
किसी गूंगे से जा के पूछो पुकार क्या है

पल पल तड़पा है कोई आशियां बनाने में
कोई दौलतमंद क्या जाने इंतज़ार क्या है

लोगों ने बना रक्खा है आशिक़ी का मौसम भी
किसी सूखे लबों से पूछो सावन की बहार क्या है

ज़िन्दगी गुज़री है 'अम्बर' की रिश्ते गंवाने में
इससे भी बढ़कर भला कोई लाचार क्या है

बदलाव

जो आया है मुझमें, बदलाव अच्छा है
मिले जो  सफ़र  में  वो घाव अच्छा है
 
गुलाब यूँ ही नहीं बेख़ौफ़ खिलता
उसके सिपाहियों का बर्ताव अच्छा है
 
ठहरा हुआ जल कभी पवित्र नहीं
शुद्धता में रहे वो बहाव अच्छा है
 
जो आवाज़ उठे मज़लूमों के हित में
ऐसे थोड़ा सा कड़क बर्ताव अच्छा है
 
दर दर भटक के इस मुकाम पे है ‘अम्बर’
कि लोग दूर से कहते हैं स्वभाव अच्छा है

बेतहाशा इश्क़

कैसी मुझसे चूक हुई यारों इश्क़ निभाने में
बेतहाशा चाह कर भी तन्हा रहा ज़माने में

पूछते तो सब हैं मेरी ख़ामोशी का सबब
पर लब थरथराते हैं नाम उसका बतलाने में

दुख अगर हुआ हो तुम्हें कभी मेरी बातों से
माफ़ कर दीजिएगा ग़लती हुई अनजाने में

ये वादियां और शोखियां नहीं भाती अब
दिल-जलों को पनाह मिलती है वीराने में

कभी नाम भर से तेरे आ जाती थी मुस्कान
अब सुकून नहीं मिलता डूबे हैं मयख़ाने में

तक़दीर पे अपनी मैं इतराना कैसे छोडूं भला
चाँद रहता था कभी 'अम्बर' के आशियाने में

दीवानगी

ये कैसा मुझ पे तोहमत का इशारा हो गया
हर गली-मुहल्ले मेरी तिश्नगी का नज़ारा हो गया

राह-ए-मंज़िल-ए-मोहब्बत से मेरे कदम क्या गुज़रे
आवारगी-पसंद जो न था, वो भी आवारा हो गया

हर किसी की नज़रों में अब रक़ीब नज़र आता है
खटकती है दुनिया सारी अदू ज़माना सारा हो गया

दीवानगी कह लो या फ़िर पागलपन की ऊँचाईयां
इक शख़्स के लिए मर-मिटना भी गवारा हो गया

क्या नुकसान पहुंचाऊंगा मैं उसे ख़यालों में कभी
अबरू की तेग़ जिसकी बीमार का चारा हो गया

वल्लाह क्या नज़ारा है सीढियों पे हमसफ़र की
कोई तो है जहाँ में जो काफ़िर का सहारा हो गया

इश्क़ में "अम्बर" फ़क़ीरी ही रास आई हमें
कूचा-ए-यार ही मेरी पीरी ख़ुदारा हो गया।।

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