Akash

From The Writer’s Desk

नमस्कार, दोस्तों! मेरा नाम आकाश प्रजापति है और मैं गुजरात में पाटन का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र २० साल है और मैं एक आर्ट्स का विद्यार्थी हूँ।

आपको बता दूँ कि मुझे कविताएं पढ़ना और लिखना बहुत अच्छा लगता है और मैंने कविताएं लिखने की शुरुआत साल २०१९ में की थी। पहले मैं टूटी-फ़ूटी कविताएं और शायरियाँ लिख लेता था जो कुछ इस प्रकार हैं..

❛ खुदा ने कहाँ खुद को बांटा है,
बांट रखा है हमने भगवान को;
मंदिर – मस्जिद हमने बनाया,
कहाँ आशियाना बनाया है,
भगवान ने इस मंदिर – मस्जिद को ❜

मगर जब मैं टेलीग्राम पे एक पब्लिक ग्रुप में जॉइन हुआ, वहाँ पे मेरी कई नए लोगों से मुलाकात हुई और उनके द्वारा कविताओं में जो गलती मैं करता था वो सुधारने में मुझे काफ़ी मदद मिली। मुझे उन लोगों के द्वारा बहुत कुछ सीखने को मिला एवं मुझे कविताओं और ग़ज़ल के नए-नए प्रकार जानने को मिले और मेरे कठोर परिश्रम से मेरा शब्द-भंडार भी दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। एक दिन मेरे एक दोस्त ने मुझे “राइटर्स विला” के बारे में बताया और मुझे वहाँ पे आने का आमंत्रण दिया। जब मैंने वहाँ जाके उनसे मुलाकात की तो मुझे मालूम हुआ कि वो एक बढ़िया मंच है जो मुझे और मेरे लेखन को आगे ले जाएगा। मुझे “राइटर्स विला” के द्वारा बहुत कुछ सीखने को मिला एवं उनके द्वारा मेरी लेखन कौशल भी बहुत ज़्यादा सुधरती चली गयी। वो लोग हमें रोज़ नया विषय देते थे लिखने के लिए और हम पूरे उत्साह के साथ उस विषय पे लिखने का प्रयास करते थे। वहाँ पे प्रत्योयोगिता भी होती थी हमें बहुत ही आनंद आता था लिखने में, वक्त कब गुज़रता चला गया वो पता भी न चला एक इंसान जो कभी एक लफ़्ज़ भी ठीक से लिख नहीं पाता था वो आज कविताएं और ग़ज़लें लिख रहा है। ये सब “राइटर्स विला” के द्वारा ही मुमकिन हो पाया है अगर मुझे ये मंच ना मिलता तो शायद मैं इतना अच्छा न लिख पाता और ना ही इतना मेरा लेखन में नाम होता। में “राइटर्स विला” का दिल से धन्यवाद करता हु की मुझे मंच पर आने का मौका दिया।

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अब सीने से लगाया ना कर

ज़िन्दगी में नहीं आना तो ना बोल,
इन वादों पे मुझे तड़पाया ना कर…
बहुत ज़ख़्म दिए तेरे कई वादों ने,
अब किसी और को देकर परेशान ना कर…
तू आती है तो साँसें थम जाती है,
तू सामने आकर यूँ तन्हा ना कर…
बीते लमहों की यादें बहुत तड़पाती है,
उन लमहों की याद तू दिलाया ना कर…
साथ छूट गया है तेरा और मेरा,
मुझको यूँ बंधन में बांधा ना कर…
लोग कहते हैं "आकाश" अच्छा है
अब तू इस इंसान को बदनाम ना कर…
मेरी पड़छाई के साथ चल रहा हूं,
अब साथ चलने की बात ना कर…
मेरी गलियों की हवाओं से अब,
मेरा हाल-ए-दिल पूछा ना कर…
मैं अब इश्क़ करना नहीं चाहता,
अब इस ख़याल में लाया ना कर..
"आकाश" तेरे बिन जी पाएगा,
तु किसी को ये खबर ना कर…
दर्द-ए-मोहब्बत को इस तरह,
लोगों के सामने ज़ाहिर ना कर…

ऐ हवा तू एक ख़बर ले जा

ऐ जाने वाली हवा मेरी एक ख़बर ले जा,
मेरे हर दर्द की, उसके पास लहर ले जा..!!
तुझे मैं अब कभी परेशान नहीं करूंगा,
मगर उसकी यादों की दो पहर ले जा..!!
मैं अब कभी लौट के आने वाला नहीं हू,
तू उसके दिमाग से मेरा सबर ले जा..!!
उसका दिन नहीं गुज़रता कभी मेरे बिना,
तू उसके दिन में से कोई एक सहर ले जा..!!
कहीं अकेले सफ़र में, गर कुछ हो जाए मुझे,
पास उनके "आकाश" की ये कबर ले जा..!!
हमारे बिना तन्हा से हैं वो इस दुनिया में,
अगर हो सके तो उनके लिए हमसफ़र ले जा..!!

जहां को ये ख़बर नहीं है

अल्फ़ाज़-ए-हुस्न लिखूं, ऐसी नज़र नहीं है,
इश्क़ है तुमसे, जहां को ये ख़बर नहीं है..!!
क्यों इश्क़ बयान कर दू, सरेआम जहां में,
इश्क़ है तुमसे, ये कोई इश्तहार नहीं है..!!
अपना भी लूं तुझे, सारे जहां के सामने,
ये दुनिया है, इश्क़ का दरबार नहीं है..!!
अगर मैं ख़्वाब देखूं और मिल तू जाए,
इश्क़ में ऐसी भी कोई रफ्तार नहीं है..!!
तुझे देखे बिना, एक भी शाम कटी हो,
ऐसा महीने में एक भी रविवार नहीं है..!!
तू मेरी है सोच लेने से, मेरी हो जाए,
ऐसा भी मेरे पास, कोई अधिकार नहीं है..!!
जहां में अकेला इश्क़ करता है "आकाश"
ऐसा कोई भी मुझमें अहंकार नहीं है..!!

सब कुछ इधर है

ना ही कोई मंदिर,
ना कोई मस्जिद है;
बस ईंटों से जुड़ी,
ये एक मीनार है..!!
ना तो कोई खुदा,
ना कोई भगवान है;
जो दुःख में साथ खड़ा,
आज वो ही परवरदिगार है..!!
क्या है भगवदगीता,
क्या कुरान है;
ये अपने जिंदगी के,
रूल्स और रास्ते हज़ार हैं
जन्नत इधर है,
तो नर्क भी इधर है;
किसकी तलाश करते हो तुम,
तुम्हारे हर कर्म का फ़ल भी इधर है..!!

न जाने क्यूं मैं मजबूर बन बैठा हूं

सुलझनों में आज फ़िर उलझ के बैठा हूं,
पास तेरे होकर भी दूर - दूर बैठा हू..!!
तुझसे आज बिना वजह झगड़ा करके,
न जाने क्या मैं आज कसूर कर बैठा हूं..!!
एक पल भी तेरे बिना ये दिन नहीं गुज़रता,
ऐसा तो तेरे आंखों का नूर बन बैठा हूं..!!
तू तो अायी थी सामने से बात करने के लिए,
फ़िर भी न जाने क्यूं मैं मजबूर बन बैठा हूं..!!
अब तू मुझसे कभी भी मिल नहीं पाएगी,
अब तेरे सपनों का एक तसव्वुर बन बैठा हूं..!!
मनाने के लिए बहुत बार अाई तू मुझे,
फ़िर भी न जाने आज क्यूं मैं क्रूर बन बैठा हूं..!!
लोग तो अपनी ज़िन्दगी में अच्छे कर्म करते हैं,
मैं सबके सामने एक असुर बन बैठा हूं..!!
तू जब बोलती है तो फूल भी खिल उठते हैं,
तेरे ये सुरीली आवाज़ का मैं सुर बन बैठा हूं..!!
न जाने कितने लोगों को धोखा दिया मैंने,
फ़िर भी क्यूं इश्क़ में मशहूर बन बैठा हूं..!!

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